शोले ही सही आग लगाने के लिये आ
फिर तूर के मंज़र को दिखाने के लिये आ
ये किस ने कहा है मेरी तक़दीर बना दे
आ अपने ही हाथों से मिटाने के लिये आ
ऐ दोस्त मुझे गर्दिश-ए-हालात ने घेरा
तू ज़ुल्फ़ की कमली में छुपाने के लिये आ
दीवार है दुनिया इसे राहों से हटा दे
हर रस्म मुहब्बत की मिटाने के लिये आ
मतलब तेरी आमद से है दरमाँ से नहीं
"हसरत" की क़सम दिल ही दुखाने के लिये आ
-हसरत जयपुरी
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Wednesday, September 7, 2011
शोले ही सही आग लगाने के लिये आ
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नज्म,
शोले ही सही आग लगाने के लिये आ,
हसरत जयपुरी
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