बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी जैसी माँ
याद आती है चौका बासन
चिमटा फुँकनी जैसी माँ
बान की खूर्रीं खाट के ऊपर
हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी
थकी दुपहरी जैसी माँ
चिड़ियों की चहकार में गूँजे
राधा-मोहन अली-अली
मुर्गे की आवाज़ से खुलती
घर की कुंडी जैसी माँ
बीवी बेटी बहन पड़ोसन
थोड़ी थोड़ी सी सब में
दिनभर एक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी जैसी माँ
बाँट के अपना चेहरा माथा
आँखें जाने कहाँ गईं
फटे पुराने इक अलबम में
चंचल लड़की जैसी माँ
- निदा फ़ाज़ली
Showing posts with label बेसन की सोंधी रोटी. Show all posts
Showing posts with label बेसन की सोंधी रोटी. Show all posts
Sunday, June 12, 2011
बेसन की सोंधी रोटी
Labels:
नज्म,
निदा फ़ाज़ली,
बेसन की सोंधी रोटी,
माँ
Subscribe to:
Posts (Atom)