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Thursday, August 18, 2011

कोई मौसम तुम सा


कोई मौसम तुम सा आए
धरती का ये जीवन दुष्कर
देख देख प्रियतम वो अम्बर
झर झर नीर बहाए
कोई मौसम तुम सा आए

उठे गंध वह भीना भीना
जैसे ओढ़े आंचल झीना
धरा प्रणय रस सिक्त अघाये
कोई मौसम तुम सा आए

आए चुपके से कुछ अक्सर
जैसे शरद उंगलियों में भर
नटखट सखी गुदगुदा जाए
कोई मौसम तुम सा आए

या जैसे रक्तिम पलाश वन
अमलतास के स्वर्णिम तरुवर
धरती का आंचल रंग जाए
कोई मौसम तुम सा आए

-जया पाठक

Friday, August 5, 2011

एक गीत और कहो

सरसों के रंग-सा
महुए की गंध-सा
एक गीत और कहो
मौसमी वसंत का।
होठों पर आने दो
रुके हुए बोल
रंगों में बसने दो
याद के हिंदोल
अलकों में झरने दो
गहराती शाम
झील में पिघलने दो
प्यार के पैगाम
अपनों के संग-सा
बहती उमंग-सा
एक गीत और कहो
मौसमी वसंत का।
मलयानिल झोंकों में
डूबते दलान
केसरिया होने दो
बाँह के सिवान
अंगों में खिलने दो
टेसू के फूल
साँसों तक बहने दो
रेशमी दुकूल
तितली के रंग-सा
उड़ती पतंग-सा
एक गीत और कहो
मौसमी वसंत का।
-पूर्णिमा वर्मन

Friday, July 8, 2011

पानी वर्षा री

पी के फूटे आज प्यार के
पानी बरसा री
हरियाली छा गई,
हमारे सावन सरसा री


बादल छाए आसमान में,
धरती फूली री
भरी सुहागिन, आज माँग में
भूली-भूली री
बिजली चमकी भाग सरीखी,
दादुर बोले री
अंध प्रान-सी बही,
उड़े पंछी अनमोले री
छिन-छिन उठी हिलोर
मगन-मन पागल दरसा री


फिसली-सी पगडंडी,
खिसकी आँख लजीली री
इंद्रधनुष रंग-रंगी आज मैं
सहज रंगीली री
रुन-झुन बिछिया आज,
हिला डुल मेरी बेनी री
ऊँचे-ऊँचे पैंग हिंडोला
सरग-नसेनी री
और सखी, सुन मोर विजन
वन दीखे घर-सा री


फुर-फुर उड़ी फुहार
अलक दल मोती छाए री
खड़ी खेत के बीच किसानिन
कजली गाए री
झर-झर झरना झरे
आज मन-प्रान सिहाये री
कौन जनम के पुन्न कि ऐसे
औसर आए री
रात सखी सुन, गात मुदित मन
साजन परसा री

-भवानीप्रसाद मिश्र

Friday, April 29, 2011

गरमी में प्रात:काल

गरमी में प्रात:काल पवन

बेला से खेला करता जब

तब याद तुम्‍हारी आती है।


जब मन में लाखों बार गया-

आया सुख सपनों का मेला,

जब मैंने घोर प्रतीक्षा के

युग का पल-पल जल-जल झेला,

मिलने के उन दो यामों ने

दिखलाई अपनी परछाईं,

वह दिन ही था बस दिन मुझको

वह बेला थी मुझको बेला;

उड़ती छाया सी वे घड़ि‍याँ

बीतीं कब की लेकिन तब से,

गरमी में प्रात:काल पवन

बेला से खेला करता जब

तब याद तुम्‍हारी आती है।


तुमने जिन सुमनों से उस दिन

केशों का रूप सजाया था,

उनका सौरभ तुमसे पहले

मुझसे मिलने को आया था,

बह गंध गई गठबंध करा

तुमसे, उन चंचल घ‍ड़ि‍यों से,

उस सुख से जो उस दिन मेरे

प्राणों के बीच समाया था;

वह गंध उठा जब करती है

दिल बैठ न जाने जाता क्‍यों;

गरमी में प्रात:काल पवन,

प्रिय, ठंडी आहें भरता जब

तब याद तुम्‍हारी आती है।

गरमी में प्रात:काल पवन

बेला से खेला करता जब

तब याद तुम्‍हारी आती है।


चितवन जिस ओर गई उसने

मृदों फूलों की वर्षा कर दी,

मादक मुसकानों ने मेरी

गोदी पंखुरियों से भर दी

हाथों में हाथ लिए, आए

अंजली में पुष्‍पों से गुच्‍छे,

जब तुमने मेरी अधरों पर

अधरों की कोमलता धर दी,

कुसुमायुध का शर ही मानो

मेरे अंतर में पैठ गया!

गरमी में प्रात:काल पवन

कलियों को चूम सिहरता जब

तब याद तुम्‍हारी आती है।


गरमी में प्रात:काल पवन

बेला से खेला करता जब

तब याद तुम्‍हारी आती है।
-हरिवंशराय बच्चन

Thursday, April 28, 2011

ग्रीष्म के स्तूप

झर रही है
ताड़ की इन उँगलियों से धूप
करतलों की
छाँह बैठा
दिन फटकता सूप
बन रहे हैं ग्रीष्म के स्तूप।
कोचिया के
सघन हरियल केश
क्यारियों में
फूल के उपदेश
खिलखिलाता दूब का टुकड़ा
दिखाता स्वप्न के दर्पन
सफलता के -
उफनते कूप
बन रहे हैं ग्रीष्म के स्तूप।
पारदर्शी याद के
खरगोश
रेत के पार बैठे
ताकते ख़ामोश
ऊपर चढ़ रही बेलें
अलिंदों पर
काटती हैं
द्वार लटकी ऊब
बन रहे हैं ग्रीष्म के स्तूप।
चहकते
मन बोल चिड़ियों के
दहकते
गुलमोहर परियों से
रंग रही
प्राचीर पर सोना
लहकती
दोपहर है खूब
बन रहे हैं ग्रीष्म के स्तूप।
-पूर्णिमा वर्मन