काँटों में बिंधे हुए फूलों के हार-सी
लेटी है प्राण-प्रिया पत्नी बीमार-सी
और मैं लाचार पति, निर्धन ।
समय-पर्यंक
आयु-चादर अति अल्पकाय,
सिमटी-सी
समझाती जीने का अभिप्राय,
आह-वणिक
करता है साँसों का व्यवसाय
खुशियों के मौसम में घायल त्यौहार-सी
आशाएँ महलों की गिरती दीवार-सी
और मैं विमूढ़मति, आँगन।
ज्योतिलग्न लौटी
तम-पाहन से टकरायी
हृदय-कक्ष सूना,
हर पूजा भी घबरायी
मृत्युदान-याचक है,
जीवन यह विषपायी
भस्म-भरी कालिख़ में बुझते अंगार-सी
तस्वीरें मिटी हुईं टूटे श्रृंगार-सी
और मैं पतझर-गति, साजन ।
-कुँअर बेचैन
Showing posts with label और मैं लाचार पति निर्धन. Show all posts
Showing posts with label और मैं लाचार पति निर्धन. Show all posts
Thursday, November 3, 2011
और मैं लाचार पति निर्धन
Labels:
life,
nostalgia,
और मैं लाचार पति निर्धन,
कुँअर बेचैन,
हिंदी कविता
Subscribe to:
Posts (Atom)