Friday, April 10, 2026

 रौनक़-ए-काज़िब (झूठी चमक)

थी गवाही मुस्तैद दुनिया की हर इक तहरीर में,

अपनी रूह की वकालत करना भूल गए हम।


पूछता है आईना देख कर ये रौनक़-ए-काज़िब,

किसका नूर चेहरे पे सजाना भूल गए हम।


नींद की किश्तें चुका कर शहर को आबाद किया,

मसनदें क्या मिलीं कि ख़्वाब बुनना भूल गए हम।


किरदार की खुशबू को ढूँढो न इस मिट्टी में,

जिस्म है उधार, ये समझना भूल गए हम।


किराए की हँसी चेहरे पे पहने रहे उम्र भर,

आँख क्या छलकी कि मुस्कुराना भूल गए हम।


बेच डाली मुस्कुराहट इक खिलौने के लिए,

ख़ुद अपनी हँसी से आँख मिलाना भूल गए हम।


वक़्त ने 'साहब' वसूला है महसूल हर मोड़ पर,

ज़िंदगी जीत कर भी क्या जीतना भूल गए हम।

Tuesday, March 31, 2026

 पुरानी साख

न रेशम की लकीरें हैं, न मंज़िल का बुलावा है 

मगर इन पाँव के छालों में, चलने का छलावा है 

अमीरी शहर की तो, काँच के कमरों में सहमी है 

हमारा घर तो चाहत का, सुनहरा सा बुलावा है


यहाँ तो नेह के धागे, महज़ चाँदी से बुनते हैं 

वफ़ा की सिसकियाँ भी, अब तो बाज़ारों में सुनते हैं 

मगर हम आज भी उस धूप की ख़ुशबू को छूते हैं 

पुरानी साख का ही, दिल हमारा एक सरमाया है


बड़ी इन बस्तियों में, आसमाँ भी बँट गया देखो 

किसी के हाथ तारा, तो किसी के चाँद आया है 

मगर हम छत पे अपनी, कायनातें ओढ़ लेते हैं 

हमें ऊँची मुंडेरों ने, भला कब फिर लुभाया है?


नहीं है पास अपने, ज़र-सितारों की नुमाइश अब 

न ऊँचे कारोबारों की, बची कोई भी प्यास अब 

मगर तारों का ये उजला, लिबास अपने ही हिस्से है 

इसी में ज़िंदगी ने, मुस्कुराना सीख रक्खा है


न झुक पाए कभी हम, झूठी इस चमक के आगे 

न बेची साख हमने, इन मुनाफ़ों के भी आगे 

हमारी सादगी ही, पुरखों की सबसे बड़ी दौलत 

यही अपना सलीका है, यही अपना ठिकाना है

Saturday, March 7, 2026

 रूह के धागे

मेरे हाथों में न कोई जादुई चिराग़ है,

न मेरे पास सदियों का कोई ख़ज़ाना है,

मैंने तो बस अपनी रूह के धागों से,

तुम्हारी ख़ातिर एक मख़मली साया सजाया है।

गर मेरे बस में वक़्त की रेशमी डोर होती,

तो मैं गुज़रे हुए लम्हों से तुम्हारा लिबास बुनता,

सावन की पहली बूंद को तुम्हारी अंगूठी बनाता,

और धूप की सुनहरी किरणों से तुम्हारा अक्स संवारता।

अगर मेरे बस में ये बादलों की स़फेद रुई होती,

तो मैं इससे तुम्हारे लिए एक नरम सी ज़मीन ढालता,

चुनता समंदर की लहरों से संगीत के कुछ क़तरे,

और तुम्हारे रास्ते में ख़ामोश ख़ुशबू सी बिछाता।

मगर मेरे पास तो बस मेरी ये पहली लरज़िश है,

जिसे मैंने अपनी हर दुआ की पहली महक बनाया है,

यही मेरा कुल सरमाया, यही मेरी ज़मीन है,

इन्हें बिछा दिया है मैंने सिर्फ तुम्हारे लिए।

ज़रा नज़ाकत से कदम रखना इन रास्तों पर तुम,

क्योंकि ये मेरे वजूद की मख़मली सरहदें हैं,

जैसे किसी ओस की बूंद में ठहरी हुई कोई सांस हो,

ज़रा सी ठेस लगी तो जो मिट जाने वाली तस्वीर हैं।

पैर रखना तो इस तरह कि आहट भी न हो,

क्योंकि तुमने मेरे तसव्वुर की सरहद छुई है,

तुम्हारे पैरों की आहट से ये धड़क उठते हैं,

कि इनमें बसी मेरी उम्र भर की इबादत है।


Thursday, February 12, 2026

 

प्राण-रश्मि: एक अनंत यात्रा


नज़र का फेर है सारा, कोई पत्थर, कोई खुदा देखे,

कोई इस ख़ाक के ढेर में, फकत अपनी फना देखे।

मगर जो डूब जाए तेरी धड़कन के सन्नाटे में,

वो हर ज़र्रे की आँखों में, तेरा ही चेहरा सदा देखे।


I

मूरत-काँच के इस ढलते में, रूप ही कोई ढल जाएगा,

नूर-शहर की उन गलियों में, वजूद ही कोई जल जाएगा,

तारों की इस धुंधली महफ़िल में, एक सिसकी जागेगी,

जब ख़्वाबों की ये थकी नाव, साहिल से आगे भागेगी!


​नभ-कुंजों की इन परतों में, हम दो सरगम गूँजेंगे,

जब मौन-शिखर की उन गहराइयों में, अपनी परछाईं पूजेंगे,

जब इस विराट के इस पर्दे पर, कोई नक़्शा न रह पाएगा,

तब मूक मिलन की यह खुशबू, ख़ुद ही दिशा बन जाएगी!

अभी यहाँ यह प्राण-रश्मि है, कल ख़ुद को फिर दोहराएगी!


​II

नील काँच की इस सीपी में, धड़कन कोई जागेगी,

वक़्त-धनुष की इन रातों में, हसरत कोई भागेगी,

जब बिम्ब-नगर की इन धुंधली, परतों से रूप निखरेंगे,

तब मर्म-गगन के पंछी सब, अपने में नीड़ उतरेंगे!


​शून्य-अरण्य की उन वीथियों में, हम मलयज-सा महकेंगे,

मौन-राग की उन धुन-लहरों पर, स्वर बनकर हम चहकेंगे,

जब विस्मृति के उस सागर में, कोई किनारा न रह पाएगा,

तब मूक मिलन का यह जादू, ध्रुवतारा बन जाएगा!

अभी यहाँ यह स्वप्न-नशीला, वहाँ सत्य सवेरा जागेगा!


​III

चंदन-सा यह गात सजीला, स्वर्ण-धूप सा चमकेगा,

अधर-पंखुड़ी के कोनों में, मौन हमारा महकेगा,

जब नयनों के इन दर्पण में, प्रतिबिम्बों का अंत होगा,

तब रेशम-सी इन छुअन का, सन्नाटा भी जीवंत होगा!


​साँसों के इस कोमल घर में, हम दो ज्योति समाएँगे,

अंग-राग की इस सीमा से, अंबर तक उड़ जाएँगे,

जब लय-प्रलय की इस संधि पर, काल स्वयं थम जाएगा,

तब प्रेम-समर्पण का यह क्षण, युग-युगांतर कहलाएगा!

अभी यहाँ यह रूप-झलक है, वहाँ अमित अनुराग रहेगा!



मिट जाएँगे शब्द सभी पर, यह सरगम रह जाएगी,

जब हम भी न होंगे तब भी, अपनी लय बह जाएगी!