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Monday, December 24, 2012

क्रिसमस

छुटि्टयों का मौसम है
त्योहार की तैयारी है
रौशन हैं इमारतें
जैसे जन्नत पधारी है


कड़ाके की ठंड है
और बादल भी भारी है
बावजूद इसके लोगों में जोश है
और बच्चे मार रहे किलकारी हैं
यहाँ तक कि पतझड़ की पत्तियाँ भी
लग रही सबको प्यारी हैं
दे रहे हैं वो भी दान
जो धन के पुजारी हैं।


खुश हैं ख़रीदार
और व्यस्त व्यापारी हैं
खुशहाल हैं दोनों
जबकि दोनों ही उधारी हैं


भूल गई यीशु का जनम
ये दुनिया संसारी है
भाग रही है उसके पीछे
जिसे हो हो हो की बीमारी है


लाल सूट और सफ़ेद दाढ़ी
क्या शान से सँवारी है
मिलता है वो मॉल में
पक्का बाज़ारी है


बच्चे हैं उसके दीवाने
जैसे जादू की पिटारी है
झूम रहे हैं जम्हूरे वैसे
जैसे झूमता मदारी हैं


    -राहुल उपाध्याय