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Sunday, January 20, 2013

ठुकरा दो या प्यार करो

देव! तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते हैं।
सेवा में बहुमुल्य भेंट वे कई रंग की लाते हैं॥

धूमधाम से साजबाज से वे मंदिर में आते हैं।
मुक्तामणि बहुमुल्य वस्तुऐं लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं॥

मैं ही हूँ गरीबिनी ऐसी जो कुछ साथ नहीं लायी।
फिर भी साहस कर मंदिर में पूजा करने चली आयी॥

धूप-दीप-नैवेद्य नहीं है झांकी का श्रृंगार नहीं।
हाय! गले में पहनाने को फूलों का भी हार नहीं॥

कैसे करूँ कीर्तन, मेरे स्वर में है माधुर्य नहीं।
मन का भाव प्रकट करने को वाणी में चातुर्य नहीं॥

नहीं दान है, नहीं दक्षिणा खाली हाथ चली आयी।
पूजा की विधि नहीं जानती, फिर भी नाथ! चली आयी॥

पूजा और पुजापा प्रभुवर! इसी पुजारिन को समझो।
दान-दक्षिणा और निछावर इसी भिखारिन को समझो॥

मैं उनमत्त प्रेम की प्यासी हृदय दिखाने आयी हूँ।
जो कुछ है, वह यही पास है, इसे चढ़ाने आयी हूँ॥

चरणों पर अर्पित है, इसको चाहो तो स्वीकार करो।
यह तो वस्तु तुम्हारी ही है ठुकरा दो या प्यार करो॥

- सुभद्रा कुमारी चौहान

Monday, December 12, 2011

तिब्बत

तिब्बत से आये हुए
लामा घूमते रहते हैं
आजकल मंत्र बुदबुदाते

उनके खच्चरों के झुंड
बगीचों में उतरते हैं
गेंदे के पौधों को नहीं चरते

गेंदे के एक फूल में
कितने फूल होते हैं
पापा ?

तिब्बत में बरसात
जब होती है
तब हम किस मौसम में
होते हैं ?

तिब्बत में जब तीन बजते हैं
तब हम किस समय में
होते हैं ?

तिब्बत में
गेंदे के फूल होते हैं
क्या पापा ?

लामा शंख बजाते है पापा?

पापा लामाओं को
कंबल ओढ़ कर
अंधेरे में
तेज़-तेज़ चलते हुए देखा है
कभी ?

जब लोग मर जाते हैं
तब उनकी कब्रों के चारों ओर
सिर झुका कर
खड़े हो जाते हैं लामा

वे मंत्र नहीं पढ़ते।
वे फुसफुसाते हैं … तिब्बत...
तिब्बत…
तिब्बत-तिब्बत...
तिब्बत - तिब्बत - तिब्बत...
तिब्बत-तिब्बत ...
तिब्बत…
तिब्बत -तिब्बत...
तिब्बत ……

और रोते रहते हैं
रात-रात भर।

क्या लामा
हमारी तरह ही
रोते हैं
पापा ?

-उदय प्रकाश

जीवन परिचय- उदय प्रकाश (१ जनवरी, १९५२) एक कवि कथाकार और फिल्मकार हैं। इनकी कुछ प्रमुख कृतियाँ सुनो कारीगर, अबूतर कबूतर, रात में हारमोनियम(कविता संग्रह), दरियायी घोड़ा, तिरिछ, और अंत में प्रार्थना, पॉलगोमरा का स्कूटर और रात में हारमोनियम (कहानी संग्रह) ईश्वर की आंच (निबंध और आलोचना संग्रह) पीली छतरीवाली लड़की (लघु उपन्यास) इंदिरा गांधी की आखिरी लड़ाई, कला अनुभव, लाल घास पर नीले घोड़े(अनुवाद) हैं। १९८० में अपनी कविता 'तिब्बत' के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित ,ओम प्रकाश सम्मान,श्रीकांत वर्मा पुरस्कार,मुक्तिबोध सम्मान,साहित्यकार सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं।

Tuesday, April 26, 2011

गुलज़ार

जब भी यह दिल उदास होता है
जाने कौन आस-पास होता है

होंठ चुपचाप बोलते हों जब
सांस कुछ तेज़-तेज़ चलती हो
आंखें जब दे रही हों आवाज़ें
ठंडी आहों में सांस जलती हो

आँख में तैरती हैं तसवीरें
तेरा चेहरा तेरा ख़याल लिए
आईना देखता है जब मुझको
एक मासूम सा सवाल लिए


कोई वादा नहीं किया लेकिन
क्यों तेरा इंतजार रहता है
बेवजह जब क़रार मिल जाए
दिल बड़ा बेकरार रहता है


जब भी यह दिल उदास होता है
जाने कौन आस-पास होता है
-गुलज़ार

Friday, June 4, 2010

मौन निमंत्रण



स्तब्ध ज्योत्सना में जब संसार
चकित रहता शिशु-सा नादान
विश्व की पलकों पर सुकुमार
विचरते हैं जब स्वप्न अजान,
न जाने, नक्षत्रों से कौन
निमंत्रण मुझे भेजता मौन!

सघन मेघों का भीमाकाश
गरजता है जब तमसाकार
दीर्घ भरता समीर निःश्वास
प्रखर झरती जब पावस चार
न जाने, तपक तड़ित में कौन
मुझे इंगित करता तब मौन!

देख वसुधा का यौवन भार
गूंज उठता है जब मधुमास
विधुर उर के-से मृदु उद्ख्रार
कुसुम जब खुल पड़ते सोच्छ्‌वास
न जाने, सौरभ के मिस कौन
संदेशा मुझे भेजता मौन!

क्षब्ध जल शिखरों में जब बात
सिंधु में मथकर फेनाकार
बुलबुलों का व्याकुल संसार
बना बिथुरा देती अज्ञात
उठा तब लहरों से कर कौन
न जाने, मुझे बुलाता मौन!

स्वर्ण, सुख, श्री, सौरभ में भोर
विश्व को देती है जब बोर
विहग-कुल की कल कंठ हिलोर
मिला देती भू-नभ के छोर
न जाने, अलस पलक दल कौन
खोल देता तब मेरे मौन!

तुमुल तम में जब एकाकार
ऊंघता एक साथ संसार
भीरु झींगुर कुल की झनकार
कंपा देती तंद्रा के तार
न जाने, खद्योतों से कौन
मुझे पथ दिखलाता तब मौन!

कनक छाया में, जब कि सकाल
खोलती कलिका उर के द्वार
सुरभि पीड़ित मधुपों के बाल
तड़प, बन जाते हैं गुंजार
न जाने, ढुलक ओस में कौन
खींच लेता तब मेरे मौन!

बिछा कार्यों का गुरुतर भार
दिवस को दे सुवर्ण अवसान
शून्य शय्या में, श्रमित अपार
जुड़ाती जब मैं आकुल प्राण
न जाने मुझे स्वप्न में कौन
फिराता छाया जग में मौन!

न जाने कौन, अये द्युतिमान!
जान मुझको अबोध, अज्ञान
सुझाते हो तुम पथ अनजान
फूंक देते छिद्रों में गान
अहे सुख-दुख के सहचर मौन!
नहीं कह सकती तुम हो कौन!!
-सुमित्रानंदन पंत