प्रभु! मेरे सपने तो भोले हैं,
दृग-जल से इनको सींचा है,
मृदु पलकों पर पाला है।
हल्के-हल्के पंख इन्हें दो,
सच्चाई तक पहुँचाना है।
घनश्याम-खण्ड-सी आँखों में
क्यों बहती अविरल जल धारा है?
क्यों लाखों दीपों की ज्योति को
एक तम हर ले जाता है?
ना अभिमन्यु पर कोई तीर चले,
ना नारी का कोई चीर हरे।
ना लाखों लोगों पर, अब
रावण का ही राज चले।
क्यों विस्तृत-नभ के कोनों पर,
धूम उठते हैं दिग्दाहों के?
क्यों मधुशाला के प्यालों की खनखन
चुप कर देती है स्वर वीणाओं के?
न हो प्रकाश का सिन्धु अपरिमित,
पर हर घर में दीप जले।
संसार हो झिलमिल खुशियों से,
कोई गाँधी की पीर हरे।
क्यों नहीं सुनाई देती है, पेड़ों पर
चिरपिर चिड़ियों की?
जाने क्यों विस्मृत होती जाती है,
कल-कल, लघु सरिताओं की?
न आहों की बात चले,
न रुदन का शोर जगे।
कालिन्दी के तट पर फिर से,
कान्हा का संगीत जगे।
सृष्टि की रचना में प्रभु,
क्यों पंथ-मतों को स्थान दिया?
संसृति के विनाश को फिर,
मनुज-कर-विष-बाण दिया।
शिव-सुन्दरतम् प्रवीर बने,
हलाहल को ना सिन्धु मंथन हो।
स्नेह-संगीत अनन्त-विश्व में,
मानवता-हित-संरक्षक हो।
शस्य-श्यामला धरती पर क्यों,
पड़ती दुर्भिक्षों की छाया है?
और अन्नपूर्णा नारी का, क्यों
आँसू से भीगा आँचल है?
इन दुर्भिक्षों से लड़ने को
मनुज को स्वयं आना होगा।
करुणा-प्रेम-अहिंसा को,
मानवता का शस्त्र बनाना होगा।
साधन, शक्ति, समय, श्रम को,
व्यर्थ गँवायें न धन को।
मीती जगत की रीति बने,
उर-अंतर में रसधार बहे।
सृजन-उपासक-रवि उदित हो,
संहारक-कारा का अंत करे।
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Wednesday, April 29, 2009
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