जो तुम आ जाते एक बार
कितनी करूणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग;
गाता प्राणों का तार तार
अनुराग भरा उन्माद राग;
आँसू लेते वे पथ पखार|
हंस उठते पल में आर्द्र नयन
धुल जाता होठों से विषाद,
छा जाता जीवन में बसंत
लुट जाता चिर संचित विराग;
आँखें देतीं सर्वस्व वार|
-महादेवी वर्मा
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Saturday, October 29, 2011
जो तुम आ जाते एक बार
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प्रेम,
महादेवी वर्मा,
हिंदी
Monday, October 24, 2011
मेरे दीपक
मेरे दीपक
मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!
युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल;
प्रियतम का पथ आलोकित कर!
सौरभ फैला विपुल धूप बन, मृदुल मोम-सा घुल रे मृदु तन,
दे प्रकाश का सिंधु अपरिमित, तेरे जीवन का अणु गल-गल!
पुलक-पुलक मेरे दीपक जल!
सारे शीतल कोमल नूतन, माँग रहे तुझसे ज्वाला-कण;
विश्वशलभ सिर धुन कहता मैं हाय न जल पाया तुझमें मिल!
सिहर-सिहर मेरे दीपक जल!
जलते नभ में देख असंख्यक, स्नेहहीन नित कितने दीपक;
जलमय सागर का उर जलता, विद्युत ले घिरता है बादल!
विहँस-विहँस मेरे दीपक जल!
द्रुम के अंग हरित कोमलतम, ज्वाला को करते हृदयंगम;
वसुधा के जड़ अंतर में भी, बंदी है तापों की हलचल!
बिखर-बिखर मेरे दीपक जल!
मेरे निश्वासों से दुततर, सुभग न तू बुझने का भय कर,
मैं अँचल की ओट किए हूँ, अपनी मृदु पलकों से चंचल!
सहज-सहज मेरे दीपक जल!
सीमा ही लघुता का बंधन, है अनादि तू मत घड़ियाँ गिन,
मैं दृग के अक्षय कोशों से तुझमें भरती हूँ आँसू-जल!
सजल-सजल मेरे दीपक जल!
तम असीम तेरा प्रकाश चिर, खेलेंगे नव खेल निरंतर,
तम के अणु-अणु में विद्युत-सा अमिट चित्र अंकित करता चल!
सरल-सरल मेरे दीपक जल!
तू जल जल होता जितना क्षय, वह समीप आता छलनामय,
मधुर मिलन में मिट जाना तू उसकी उज्जवल स्मित में घुल-खिल!
मदिर-मदिर मेरे दीपक जल!
-महादेवी वर्मा
मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!
युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल;
प्रियतम का पथ आलोकित कर!
सौरभ फैला विपुल धूप बन, मृदुल मोम-सा घुल रे मृदु तन,
दे प्रकाश का सिंधु अपरिमित, तेरे जीवन का अणु गल-गल!
पुलक-पुलक मेरे दीपक जल!
सारे शीतल कोमल नूतन, माँग रहे तुझसे ज्वाला-कण;
विश्वशलभ सिर धुन कहता मैं हाय न जल पाया तुझमें मिल!
सिहर-सिहर मेरे दीपक जल!
जलते नभ में देख असंख्यक, स्नेहहीन नित कितने दीपक;
जलमय सागर का उर जलता, विद्युत ले घिरता है बादल!
विहँस-विहँस मेरे दीपक जल!
द्रुम के अंग हरित कोमलतम, ज्वाला को करते हृदयंगम;
वसुधा के जड़ अंतर में भी, बंदी है तापों की हलचल!
बिखर-बिखर मेरे दीपक जल!
मेरे निश्वासों से दुततर, सुभग न तू बुझने का भय कर,
मैं अँचल की ओट किए हूँ, अपनी मृदु पलकों से चंचल!
सहज-सहज मेरे दीपक जल!
सीमा ही लघुता का बंधन, है अनादि तू मत घड़ियाँ गिन,
मैं दृग के अक्षय कोशों से तुझमें भरती हूँ आँसू-जल!
सजल-सजल मेरे दीपक जल!
तम असीम तेरा प्रकाश चिर, खेलेंगे नव खेल निरंतर,
तम के अणु-अणु में विद्युत-सा अमिट चित्र अंकित करता चल!
सरल-सरल मेरे दीपक जल!
तू जल जल होता जितना क्षय, वह समीप आता छलनामय,
मधुर मिलन में मिट जाना तू उसकी उज्जवल स्मित में घुल-खिल!
मदिर-मदिर मेरे दीपक जल!
-महादेवी वर्मा
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दीपावली,
महादेवी वर्मा,
मेरे दीपक
Thursday, July 28, 2011
दीप कहीं सोता है
दीप कहीं सोता है
पुजारी दीप कहीं सोता है!
जो दृग दानों के आभारी
उर वरदानों के व्यापारी
जिन अधरों पर काँप रही है
अनमाँगी भिक्षाएँ सारी
वे थकते, हर साँस सौंप देने को यह रोता है।
कुम्हला चले प्रसून सुहासी
धूप रही पाषाण समा-सी
झरा धूल सा चंदन छाई
निर्माल्यों में दीन उदासी
मुसकाने बन लौट रहे यह जितने पल खोता है।
इस चितवन की अमिट निशानी
अंगारे का पारस पानी
इसको छूकर लौह तिमिर
लिखने लगता है स्वर्ण कहानी
किरणों के अंकुर बनते यह जो सपने बोता है।
गर्जन के शंखों से हो के
आने दो झंझा के झोंके
खोलो रुद्ध झरोखे, मंदिर
के न रहो द्वारों को रोके
हर झोंके पर प्रणत, इष्ट के धूमिल पग धोता है।
लय छंदों में जग बँध जाता
सित घन विहग पंख फैलाता
विद्रुम के रथ पर आता दिन
जब मोती की रेणु उड़ाता
उसकी स्मित का आदि, अंत इसके पथ का होता है।
-महादेवी वर्मा
पुजारी दीप कहीं सोता है!
जो दृग दानों के आभारी
उर वरदानों के व्यापारी
जिन अधरों पर काँप रही है
अनमाँगी भिक्षाएँ सारी
वे थकते, हर साँस सौंप देने को यह रोता है।
कुम्हला चले प्रसून सुहासी
धूप रही पाषाण समा-सी
झरा धूल सा चंदन छाई
निर्माल्यों में दीन उदासी
मुसकाने बन लौट रहे यह जितने पल खोता है।
इस चितवन की अमिट निशानी
अंगारे का पारस पानी
इसको छूकर लौह तिमिर
लिखने लगता है स्वर्ण कहानी
किरणों के अंकुर बनते यह जो सपने बोता है।
गर्जन के शंखों से हो के
आने दो झंझा के झोंके
खोलो रुद्ध झरोखे, मंदिर
के न रहो द्वारों को रोके
हर झोंके पर प्रणत, इष्ट के धूमिल पग धोता है।
लय छंदों में जग बँध जाता
सित घन विहग पंख फैलाता
विद्रुम के रथ पर आता दिन
जब मोती की रेणु उड़ाता
उसकी स्मित का आदि, अंत इसके पथ का होता है।
-महादेवी वर्मा
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दीप कहीं सोता है,
महादेवी वर्मा,
हिंदी
Tuesday, May 31, 2011
मैं नीर भरी दुख की बदली
मैं नीर भरी दुख की बदली!
स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,
क्रंदन में आहत विश्व हँसा,
नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झणी मचली!
मेरा पग पग संगीत भरा,
श्वासों में स्वप्न पराग झरा,
नभ के नव रंग बुनते दुकूल,
छाया में मलय बयार पली!
मैं क्षितिज भृकुटि पर घिर धूमिल,
चिंता का भार बनी अविरल,
रज-कण पर जल-कण हो बरसी,
नव जीवन-अंकुर बन निकली!
पथ न मलिन करता आना,
पद चिह्न न दे जाता जाना,
सुधि मेरे आगम की जग में,
सुख की सिहरन हो अंत खिली!
विस्तृत नभ का कोई कोना,
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना इतिहास यही,
उमड़ी कल थी मिट आज चली!
-महादेवी वर्मा
स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,
क्रंदन में आहत विश्व हँसा,
नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झणी मचली!
मेरा पग पग संगीत भरा,
श्वासों में स्वप्न पराग झरा,
नभ के नव रंग बुनते दुकूल,
छाया में मलय बयार पली!
मैं क्षितिज भृकुटि पर घिर धूमिल,
चिंता का भार बनी अविरल,
रज-कण पर जल-कण हो बरसी,
नव जीवन-अंकुर बन निकली!
पथ न मलिन करता आना,
पद चिह्न न दे जाता जाना,
सुधि मेरे आगम की जग में,
सुख की सिहरन हो अंत खिली!
विस्तृत नभ का कोई कोना,
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना इतिहास यही,
उमड़ी कल थी मिट आज चली!
-महादेवी वर्मा
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कविता,
महादेवी वर्मा,
मैं नीर भरी दुख की बदली,
हिंदी
Thursday, April 14, 2011
कहां रहेगी चिड़िया
कहां रहेगी चिड़िया ?
आंधी आई जोर-शोर से
डाली टूटी है झकोर से
उड़ा घोंसला बेचारी का
किससे अपनी बात कहेगी
अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी ?
घर में पेड़ कहाँ से लाएँ
कैसे यह घोंसला बनाएँ
कैसे फूटे अंडे जोड़ें
किससे यह सब बात कहेगी
अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी ?
-महादेवी वर्मा
आंधी आई जोर-शोर से
डाली टूटी है झकोर से
उड़ा घोंसला बेचारी का
किससे अपनी बात कहेगी
अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी ?
घर में पेड़ कहाँ से लाएँ
कैसे यह घोंसला बनाएँ
कैसे फूटे अंडे जोड़ें
किससे यह सब बात कहेगी
अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी ?
-महादेवी वर्मा
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कविता,
कहां रहेगी चिड़िया,
बाल गीत,
महादेवी वर्मा,
हिंदी
Wednesday, March 30, 2011
मिटने का अधिकार
वे मुस्काते फूल, नहीं
जिनको आता है मुरझाना,
वे तारों के दीप, नहीं
जिनको भाता है बुझ जाना
वे सूने से नयन,नहीं
जिनमें बनते आँसू मोती,
वह प्राणों की सेज,नही
जिसमें बेसुध पीड़ा, सोती
वे नीलम के मेघ, नहीं
जिनको है घुल जाने की चाह
वह अनन्त रितुराज,नहीं
जिसने देखी जाने की राह
ऎसा तेरा लोक, वेदना
नहीं,नहीं जिसमें अवसाद,
जलना जाना नहीं, नहीं
जिसने जाना मिटने का स्वाद!
क्या अमरों का लोक मिलेगा
तेरी करुणा का उपहार
रहने दो हे देव! अरे
यह मेरे मिटने क अधिकार!
-महादेवी वर्मा
जिनको आता है मुरझाना,
वे तारों के दीप, नहीं
जिनको भाता है बुझ जाना
वे सूने से नयन,नहीं
जिनमें बनते आँसू मोती,
वह प्राणों की सेज,नही
जिसमें बेसुध पीड़ा, सोती
वे नीलम के मेघ, नहीं
जिनको है घुल जाने की चाह
वह अनन्त रितुराज,नहीं
जिसने देखी जाने की राह
ऎसा तेरा लोक, वेदना
नहीं,नहीं जिसमें अवसाद,
जलना जाना नहीं, नहीं
जिसने जाना मिटने का स्वाद!
क्या अमरों का लोक मिलेगा
तेरी करुणा का उपहार
रहने दो हे देव! अरे
यह मेरे मिटने क अधिकार!
-महादेवी वर्मा
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मिटने का अधिकार,
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