Saturday, April 2, 2011

वो अपने चेहरे में सौ अफ़ताब रखते हैं

वो अपने चेहरे में सौ आफ़ताब रखते हैं
इसीलिये तो वो रुख़ पे नक़ाब रखते हैं

वो पास बैठें तो आती है दिलरुबा ख़ुश्बू
वो अपने होठों पे खिलते गुलाब रखते हैं

हर एक वर्क़ में तुम ही तुम हो जान-ए-महबूबी
हम अपने दिल की कुछ ऐसी किताब रखते हैं

जहान-ए-इश्क़ में सोहनी कहीं दिखाई दे
हम अपनी आँख में कितने चेनाब रखते हैं

-हसरत जयपुरी

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

बेहतरीन, पढ़वाने का आभार।

Ravi Tiwari said...

वो अपने चेहरे में सौ आफ़ताब रखते हैं
इसीलिये तो वो रुख़ पे नक़ाब रखते हैं


kya baat hai.......maja aa gaya...

Surendrashukla" Bhramar" said...

विवेक जी नमस्कार और धन्यवाद आप का शीघ्र प्रतिक्रिया हेतु आइये इस दर्द को समझ हम सब कुछ अपना भी योगदान करते रहें
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर५