हम दीवानों की क्या हस्ती, आज यहाँ कल वहाँ चले
मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहाँ चले
आए बनकर उल्लास कभी, आँसू बनकर बह चले अभी
सब कहते ही रह गए, अरे तुम कैसे आए, कहाँ चले
किस ओर चले? मत ये पूछो, बस चलना है इसलिए चले
जग से उसका कुछ लिए चले, जग को अपना कुछ दिए चले
दो बात कहीं, दो बात सुनी, कुछ हँसे और फिर कुछ रोए
छक कर सुख दुःख के घूँटों को, हम एक भाव से पिए चले
हम भिखमंगों की दुनिया में, स्वछन्द लुटाकर प्यार चले
हम एक निशानी उर पर, ले असफलता का भार चले
हम मान रहित, अपमान रहित, जी भर कर खुलकर खेल चुके
हम हँसते हँसते आज यहाँ, प्राणों की बाजी हार चले
अब अपना और पराया क्या, आबाद रहें रुकने वाले
हम स्वयं बंधे थे, और स्वयं, हम अपने बन्धन तोड़ चले
-भगवतीचरण वर्मा
Thursday, April 7, 2011
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7 comments:
हम भिखमंगों की दुनिया में, स्वछन्द लुटाकर प्यार चले
हम एक निशानी उर पर, ले असफलता का भार चले
ek pankti ki hi kya kahoon sabhi pankti bahut khoobsurat abhivyakti samahit kiye hain.
Wah! -wah vivek ji
bade hi kamaal ka likh hai aapne .har panktiyan sachchai ko bayan kartin bahut hi halke-fulke masti ke andaz me aapne badi baate kah di hain.
bahut hi maja bhi aaya aur ise gunghnane ka man bhi kar raha hai.bahut hi shandaar post
bahut bahut badhai
poonam
बेहतरीन, पढ़वाने का आभार।
बडी अलमस्त प्रस्तुति है जी । आभार...
भ्रष्टाचार के खिलाफ जनयुद्ध
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
Behtar ko pasand karna bhi behtar hai... aanand dayi prastuti..
Bahut sundar vivek G
hamare blog par bhi aaye
www.pksharma1.blogspot.com
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