Monday, April 4, 2011

सब जीवन बीता जाता है

सब जीवन बीता जाता है
धूप छाँह के खेल सदॄश
सब जीवन बीता जाता है



समय भागता है प्रतिक्षण में,
नव-अतीत के तुषार-कण में,
हमें लगा कर भविष्य-रण में,
आप कहाँ छिप जाता है
सब जीवन बीता जाता है



बुल्ले, नहर, हवा के झोंके,
मेघ और बिजली के टोंके,
किसका साहस है कुछ रोके,
जीवन का वह नाता है
सब जीवन बीता जाता है



वंशी को बस बज जाने दो,
मीठी मीड़ों को आने दो,
आँख बंद करके गाने दो
जो कुछ हमको आता है



सब जीवन बीता जाता है.

-जयशंकर प्रसाद

9 comments:

Dr (Miss) Sharad Singh said...

जयशंकर प्रसाद की सुन्दर रचना की सुन्दर प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.


कृपया मेरे ब्लॉग
http://samkalinkathayatra.blogspot.com/
एवं
http://amirrorofindianhistory.blogspot.com/
पर भी आपका स्वागत है !

Vivek Jain said...

Thanks Ms Sharad Singh Ji. And i have alredy visited your blog, thats really Nice.

प्रवीण पाण्डेय said...

अति सुन्दर।

दिगम्बर नासवा said...

बुल्ले, नहर, हवा के झोंके,
मेघ और बिजली के टोंके,
किसका साहस है कुछ रोके,
जीवन का वह नाता है
सब जीवन बीता जाता है ..

बहुत सुंदर रचना है ... नवरस संचार करती ...

जयकृष्ण राय तुषार said...

भाई विवेक जैन जी बहुत ही साहित्यिक ब्लॉग है आपका अच्छा लगा बधाई और शुभकामनाएं |

जयकृष्ण राय तुषार said...

भाई विवेक जैन जी बहुत ही साहित्यिक ब्लॉग है आपका अच्छा लगा बधाई और शुभकामनाएं |

Vivek Jain said...

Thans a lot to all

कुश्वंश said...

वंशी को बस बज जाने दो,
मीठी मीड़ों को आने दो,
आँख बंद करके गाने दो
जो कुछ हमको आता है

बहुत सुंदर साहित्यिक रचना है

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

जयशंकर प्रसाद की सुन्दर रचना पढवाने का आभार ....