Monday, May 30, 2011

बादल को घिरते देखा है

अमल धवल गिरि के शिखरों पर,
बादल को घिरते देखा है।
छोटे-छोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहिन कणों को,
मानसरोवर के उन स्वर्णिम
कमलों पर गिरते देखा है,
बादलों को घिरते देखा है।

तुंग हिमालय के कंधों पर
छोटी बड़ी कई झीलें हैं,
उनके श्यामल नील सलिल में
समतल देशों से आ-आकर
पावस की ऊमस से आकुल
तिक्त-मधुर बिसतंतु खोजते
हँसों को तिरते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।

ऋतु वसंत का सुप्रभात था
मंद-मंद था अनिल बह रहा
बालारुण की मृदु किरणों थीं
अगल-बगल स्वर्णाभ शिखर थे
एक दूसरे से विरहित हो
अलग-अलग रहकर ही जिनको
सारी रात बितानी होती,
निशा काल से चिर-अभिशापित
बेबस उस चकवा-चकई का
बंद हुआ क्रंदन, फिर उनमें
उस महान सरवर के तीरे
शैवालों की हरी दरी पर
प्रणय-कलह छिड़ते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।

दुर्गम बर्फ़ानी घाटी में
शत-सहस्त्र फुट ऊँचाई पर
अलख नाभि से उठनेवाले
निज के ही उन्मादक परिमल -
के पीछे धावित हो-होकर
तरल तरुण कस्तूरी मृग को
अपने पर चिढ़ते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।

कहाँ गया धनपति कुबेर वह
कहाँ गई उसकी वह अलका
नहीं ठिकाना कालिदास के
व्योम-प्रवाही गंगाजल का,
ढूँढ़ा बहुत परंतु लगा क्या
मेघदूत का पता कहीं पर,
कौन बताए वह छायामय
बरस पड़ा होगा न यहीं पर,
जाने दो, वह कवि-कल्पित था,
मैंने तो भीषण जाड़ों में
नभ-चुंबी कैलाश शीर्ष पर,
महामेघ को झंझानिल से
गरज-गरज भिड़ते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।

शत-शत निर्झर-निर्झरणी कल
मुखरित देवदारू कानन में,
शोणित धवल भोज पत्रों से
छाई हुई कुटी के भीतर,
रंग-बिरंगे और सुगंधित
फूलों से कुंतल को साजे,
इंद्रनील की माला डाले
शंख-सरीखे सुघड़ गलों में,
कानों में कुवलय लटकाए,
शतदल लाल कमल वेणी में,
रजत-रचित मणि खचित कलामय
पान पात्र द्राक्षासव पूरित
रखे सामने अपने-अपने
लोहित चंदन की त्रिपुटी पर,
नरम निदाग बाल-कस्तूरी
मृगछालों पर पलथी मारे
मदिरारुण आँखों वाले उन
उन्मद किन्नर-किन्नरियों की
मृदुल मनोरम अँगुलियों को
वंशी पर फिरते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।
- नागार्जुन

17 comments:

कुश्वंश said...

जैन साहब क्या बात है नागार्जुन जी की ये कविता निकालकर हृदय भर दिया बधाई, नागार्जुन जी के साहित्य पर कुछ कहना बेमानी होगी, छोटे मुह बड़ी बात होगी इसलिए ...बस

prerna argal said...

लोहित चंदन की त्रिपुटी पर,
नरम निदाग बाल-कस्तूरी
मृगछालों पर पलथी मारे
मदिरारुण आँखों वाले उन
उन्मद किन्नर-किन्नरियों की
मृदुल मनोरम अँगुलियों को
वंशी पर फिरते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।bahut hi achchi rachanaa.itani achchi rachanaa padhane ke liye thanks.

Jyoti Mishra said...

beautiful piece of writing and an amazing description of rainy season !!

मनोज कुमार said...

एक बहुत ही अच्छी कविता पढवाने के लिए आभार।

शिक्षामित्र said...

बहुत चर्चित कविता है। आपने याद ताज़ा की।

शालिनी कौशिक said...

मृगछालों पर पलथी मारे
मदिरारुण आँखों वाले उन
उन्मद किन्नर-किन्नरियों की
मृदुल मनोरम अँगुलियों को
वंशी पर फिरते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।
hamesha kee tarah bahut achchhi prastuti.badhai.

शालिनी कौशिक said...

vivek ji aapke blog ne mujhe bahut prabhavit kiya hai aur isi vajah se aaj maine aapke blog ko ''ye blog achchha laga hai ''par liya hai.yadi thoda samay nikal kar hamare is blog par aap upasthit ho saken to ham kritarth honge.

veerubhai said...

बाबा नागार्जुन जी को आपने पढवाया उस ओजमय धार में हम भी बह गए -बादल को उड़ते देखा है .शुक्रिया ज़नाब का ।
विद्या सागर इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो -साइंसिज़ ,नै -दिल्ली तमाम स्न्युरोगों (न्युरोलोजिकल दिजीज़िज़ )का समाधान प्रस्तुत करता है .अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान नै दिल्ली तथा पी जी आई चंडीगढ़ में भी न्यूरोलोजी विभाग अच्छा काम कर रहा है .वैसे दिल्ली तो भाई साहब अब मेडिकल हब बन चुका है .

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

विवेक जैन जी बहुत सुन्दर संकलन आप के सुन्दर प्रयास आप की मेहनत से मन खुश हो जाता है -शुभ कामनाएं आप को
नागार्जुन जी की ये पंक्तियाँ बहुत ही प्यारी लगीं वैसे तो सभी प्यारी हैं कितना सुन्दर मन मोहक प्राकृतिक चित्रण हिम गिरि का

अलख नाभि से उठनेवाले
निज के ही उन्मादक परिमल -
के पीछे धावित हो-होकर
तरल तरुण कस्तूरी मृग को
अपने पर चिढ़ते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।
शुक्ल भ्रमर ५

Babli said...

बहुत सुन्दर और शानदार कविता! बेहद पसंद आया!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/

http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

G.N.SHAW said...

सबसे पहले बधाई नागार्जुन जी की कविताये पोस्ट करने के लिए ! बादलो की बेहद सजीव चित्रण है !

Bhushan said...

नागार्जुन की कविताओं का ओज जानता हूँ. इस प्रस्तुति के लिए आप बधाई के पात्र हैं.

प्रवीण पाण्डेय said...

मन प्रसन्न हो गया स्तरीय साहित्य पढ़कर।

Vivek Jain said...

आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद प्रोत्साहन के लिये,
-विवेक जैन

Vaanbhatt said...

पढ़ कर लगता है...कि ये रचना कैलाश-मानसरोवर यात्रा के दौरान लिखी गयी है....नागार्जुन कि शैली से परिचित करने के लिए...धन्यवाद...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

काफी दिन बाद एक सुन्दर कविता पढी, आभार!

Himanshu said...

One of my favourite poems.