Tuesday, March 31, 2026

 पुरानी साख

न रेशम की लकीरें हैं, न मंज़िल का बुलावा है 

मगर इन पाँव के छालों में, चलने का छलावा है 

अमीरी शहर की तो, काँच के कमरों में सहमी है 

हमारा घर तो चाहत का, सुनहरा सा बुलावा है


यहाँ तो नेह के धागे, महज़ चाँदी से बुनते हैं 

वफ़ा की सिसकियाँ भी, अब तो बाज़ारों में सुनते हैं 

मगर हम आज भी उस धूप की ख़ुशबू को छूते हैं 

पुरानी साख का ही, दिल हमारा एक सरमाया है


बड़ी इन बस्तियों में, आसमाँ भी बँट गया देखो 

किसी के हाथ तारा, तो किसी के चाँद आया है 

मगर हम छत पे अपनी, कायनातें ओढ़ लेते हैं 

हमें ऊँची मुंडेरों ने, भला कब फिर लुभाया है?


नहीं है पास अपने, ज़र-सितारों की नुमाइश अब 

न ऊँचे कारोबारों की, बची कोई भी प्यास अब 

मगर तारों का ये उजला, लिबास अपने ही हिस्से है 

इसी में ज़िंदगी ने, मुस्कुराना सीख रक्खा है


न झुक पाए कभी हम, झूठी इस चमक के आगे 

न बेची साख हमने, इन मुनाफ़ों के भी आगे 

हमारी सादगी ही, पुरखों की सबसे बड़ी दौलत 

यही अपना सलीका है, यही अपना ठिकाना है

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