प्राण-रश्मि: एक अनंत यात्रा
नज़र का फेर है सारा, कोई पत्थर, कोई खुदा देखे,
कोई इस ख़ाक के ढेर में, फकत अपनी फना देखे।
मगर जो डूब जाए तेरी धड़कन के सन्नाटे में,
वो हर ज़र्रे की आँखों में, तेरा ही चेहरा सदा देखे।
I
मूरत-काँच के इस ढलते में, रूप ही कोई ढल जाएगा,
नूर-शहर की उन गलियों में, वजूद ही कोई जल जाएगा,
तारों की इस धुंधली महफ़िल में, एक सिसकी जागेगी,
जब ख़्वाबों की ये थकी नाव, साहिल से आगे भागेगी!
नभ-कुंजों की इन परतों में, हम दो सरगम गूँजेंगे,
जब मौन-शिखर की उन गहराइयों में, अपनी परछाईं पूजेंगे,
जब इस विराट के इस पर्दे पर, कोई नक़्शा न रह पाएगा,
तब मूक मिलन की यह खुशबू, ख़ुद ही दिशा बन जाएगी!
अभी यहाँ यह प्राण-रश्मि है, कल ख़ुद को फिर दोहराएगी!
II
नील काँच की इस सीपी में, धड़कन कोई जागेगी,
वक़्त-धनुष की इन रातों में, हसरत कोई भागेगी,
जब बिम्ब-नगर की इन धुंधली, परतों से रूप निखरेंगे,
तब मर्म-गगन के पंछी सब, अपने में नीड़ उतरेंगे!
शून्य-अरण्य की उन वीथियों में, हम मलयज-सा महकेंगे,
मौन-राग की उन धुन-लहरों पर, स्वर बनकर हम चहकेंगे,
जब विस्मृति के उस सागर में, कोई किनारा न रह पाएगा,
तब मूक मिलन का यह जादू, ध्रुवतारा बन जाएगा!
अभी यहाँ यह स्वप्न-नशीला, वहाँ सत्य सवेरा जागेगा!
III
चंदन-सा यह गात सजीला, स्वर्ण-धूप सा चमकेगा,
अधर-पंखुड़ी के कोनों में, मौन हमारा महकेगा,
जब नयनों के इन दर्पण में, प्रतिबिम्बों का अंत होगा,
तब रेशम-सी इन छुअन का, सन्नाटा भी जीवंत होगा!
साँसों के इस कोमल घर में, हम दो ज्योति समाएँगे,
अंग-राग की इस सीमा से, अंबर तक उड़ जाएँगे,
जब लय-प्रलय की इस संधि पर, काल स्वयं थम जाएगा,
तब प्रेम-समर्पण का यह क्षण, युग-युगांतर कहलाएगा!
अभी यहाँ यह रूप-झलक है, वहाँ अमित अनुराग रहेगा!
मिट जाएँगे शब्द सभी पर, यह सरगम रह जाएगी,
जब हम भी न होंगे तब भी, अपनी लय बह जाएगी!
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